आइये कुछ ऐसी चर्चा करते हैं जिनका संबंध हमारे निजी जीवन से है। अक्सर हम अपने बच्चों को शिक्षा देते है की वो अपना कैरियर अपनी पसंद से चुने। पता है क्यों? क्योंकि हम नहीं चाहते की जो परेशानी हमे झेलनी पड़ी, वो उनको भी झेलनी पड़े। आप चाहे माने या न माने, हम आज जिस कैरियर में है, वो अपनी पसंद से नहीं है, क्योंकि हमारे जमाने में कैरियर पसंद करने की ज़िम्मेदारी माता पिता निभाते थे, हमे तो सिर्फ फरमान जारी कर दिया जाता था कि ‘मेरा बेटा तो इंजीनियर/डॉक्टर बनेगा‘।
क्या कभी आपने सोचा है, कि यदि आप, वो ना होते जो आप अभी है, तो क्या होते? चलिए सोचते है इसी बारे में, तो इंतज़ार मत करिए, लिख मारिए अपनी आप बीती। जब तक आप अपनी कहानी लिखते है, तब तक हम आपको अपनी कहानी सुना देते हैं।
ये उस समय की बात है, जब मै सातवी कक्षा मे था, एक दिन घर में बात उठी कि मेरे को क्या बनाया जाये, मजेदार बात ये है कि मेरे को इस वार्तालाप में शामिल होने कि मनाही थी, घर के बाकी सभी लोग अपनी अपनी राय रख रहे थे, गोयाकि हम कोई भैंस बकरी हो, कि इसको कैसे सजाया जाये। हम भी चुपचाप सुन रहे थे। ताऊ-जी ने कहा नालायक है, इसको किसी दुकान मे बैठा दो, थोड़े दिनो मे काम सीख लेगा तो फिर उसकी दुकान खुलवा देंगे। बड़ी बहन हमको डॉक्टर बनाने पर उतारू थी, पिताजी बोले, (सिविल) इंजीनियर बना देते है, अच्छी कमाई होती है, सभी लोग अपनी अपनी सुनाये जा रहे थे, सबके अपने अपने कारण थे| किसी ने भी हमसे नहीं पूछा। हम शुरू से ही गायक बनना चाहते थे, इसलिए जब भी मौका मिलता हम शुरू हो जाते। घर वाले भी मेरी सुरीली/बेसुरी आवाज़ से पक चुके थे, उनको ये कैरियर कमाऊ नहीं दिखता था, फिर ध्वनि प्रदूषण का भी खतरा था। फिर मेरे (बेसुरे) गाने से ये पारिवारिक समस्या से बढ़कर, मोहेल्ले की समस्या बन सकती थी। इसलिए घर वाले बोले, ना बेटा गायक न बन पाओगे, अगर बन भी गए, तो क्या गाकर रोजी रोटी कमाओगे? इसलिए गायकी को शौंक की श्रेणी में डाला गया।
अब चूंकि घर में एक चार्टर्ड अकाउंटेंट पहले से मौजूद था, इसलिए ये तो पक्का था, कि असहमति कि दशा में हमको चार्टर्ड अकाउंटेंट ही बनना था। अब सारे लोग अपने अपने कारण गिना-गिना कर थक गए, संसद कि तरह किसी भी एक डिसिजन तक नहीं पहुंचा जा सका। अंततः ताऊ-जी (प्यार से हम सभी लोग उन्हे चाचाजी ही कहा कराते थे) ने फरमान सुना दिया कि साइन्स पढ़ना इसके बूते कि बात नहीं, डॉक्टर तो किसी भी तरह से नहीं बन सकता, लिहाजा लड़का कॉमर्स पढ़ेगा और आगे चलकर अकाउंटेंट बनेगा। इस तरह से हमारे कैरियर के बारे में डिसिजन लिया गया। अब हम अमरीका में होते तो बड़े होकर घरवालों पर केस कर देते, लेकिन क्या करें, भारत में पैदा हुए, इसलिए संस्कृति कहो या फिर लोक-लिहाज का डर,सो हम भी चुपचाप इसको स्वीकार कर लिए।
हमने कॉमर्स की पढ़ाई शुरू करी, बात उस समय की है, जब हम इंटरमीडिएट (12वी कक्षा) मे हुआ करते थे, हम शुरू से ही अलमस्त टाइप के थे, दिन कहाँ गुजरा पता नहीं, अलबत्ता रात को पढ़ाई जरूर करते थे। हमारे कुछ मित्रों के बड़े भाई IIT कानपुर में पढ़ते थे, हम अक्सर साइकल उठाकर उनसे मिलने IIT कानपुर चले जाया करते, उनकी लैब में जकर टाँक झांक करते, उनकी लाइब्ररी मे बैठ जाते, लोग समझते थे, कि हम लाइब्ररी मे पढ़ने जाते थे, ये गलत था, ऐसा ओछा इल्ज़ाम आप हम पर नहीं लगा सकते। दरअसल पूरी आईआईटी में सबसे ठंडी जगह वही थी, इसलिए वहाँ जाकर कोई भी किताब खोलकर पसर जाते। धीरे धीरे लोगों से भी पहचान शुरू हुई, लोगो को गलतफहमी होने लगी कि लड़का काफी पढ़ाकू किस्म का है। अब अक्सर हमारा काफी टाइम आईआईटी में कटने लगा था। जिसका खामियाजा यानि शादी के रूप में भी हमे भुगतना पड़ा, इस दुखड़े के बारे में किसी और दिन बात करेंगे।
इधर आईआईटी वालों ने अपनी 25वी सालगिरह पर अपनी सारी प्रयोगशालाएँ पब्लिक के लिए खोल दी थी। हम तो वहाँ के रेगुलर आउट-साइडर थे ही, हम भी हर गतिविधि जैसे क्विज़ वगैरह में भाग लिए, और भगवान जाने किसकी गलती से हम एक दो क्विज़ में प्रथम स्थान पर आ गए, एक प्रोफेसर ने ताड़ लिया, बोले आओ बैठो, समझते हैं। उन्होने हमसे पूछा क्या पढ़ते हो, हम बोले कॉमर्स, प्रोफेसूर ने बोला, तुम्हारा लॉजिकल रीज़निंग अच्छा है, तुम कम्प्युटर मे शिफ्ट काहे नहीं हो जाते। अब इनको कौन समझाता कि , ये डिसिजन हमारे हाथ में नहीं था, प्रोफेसर साहब ने हमे रोजाना कम्प्युटर पर काम करने के लिए बुलाया, जिसके लिए हम तुरंत तैयार हो गए। अब शाम हम उनके साथ ही बिताते थे। उस समय के कम्प्युटर आज के तरीके के कम्प्युटर नहीं हुआ करते थे। बड़े बड़े कमरे के बराबर वाले कम्प्युटर हुआ कराते थे। खैर अब कम्प्युटर का कीड़ा तो हमको काट ही चुका था, अब कॉमर्स में किसको इंटरेस्ट होता।
हमने घर पर आकर हिम्मत करके सबको बताया की अब हम कॉमर्स नहीं पढ़ेंगे, कम्प्युटर साइन्स पढ़ेंगे, सभी बोले, इसका दिमाग खराब हो गया है, कम्प्युटर कभी भारत में आएगा नहीं, भूखे मरेगा। लेकिन हम नहीं माने, किसी तरह से इसी जद्दोजहद में बीकॉम निबटाया, लेकिन सीए के इम्तिहान में नहीं बैठे। साथ ही साथ कम्प्युटर कोर्स के बारे में भी पता करते रहे, उस समय कम्प्युटर ट्रेनिंग का मतलब साउथ इंडिया हुआ करता था, हम हिम्मत नहीं हारे, फार्म भर दिये। ढेर सारी लानते मिली, लेकिन हम अडिग रहे, इस तरह से एक अच्छा खासा चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने वाला बंदा कम्प्युटर प्रोग्रामिंग की दुनिया में उतर गया।
इस तरह से हम अपनी मर्ज़ी (भले देर से ही सही) से अपनी पसंद के कैरियर मे शिफ्ट हो गए। आपकी भी कुछ कहानी रही होगी, हमे बताना मत भूलियगा, तो लिख मारिए अपनी कहानी, पढ़ने के लिए हम है न, अपनी कहानी का लिंक देना मत भूलिएगा, तो आते रहिए और पढ़ते रहिए आपका पसंदीदा ब्लॉग।
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