कोई चौदहवीं रात का चांद बन….

कोई चौदहवीं रात का चांद बन कर तुम्हारे तसव्वुर में आया तो होगा
किसी से तो की होगी तुमने मुहब्बत किसी को गले से लगाया तो होगा

तुम्हारे ख़यालों की अंगनाईयों में मेरी याद के फूल महके तो होंगे
कभी अपनी आंखों के काजल से तुमने मेरा नाम लिख कर मिटाया तो होगा

लबों से मुहब्बत का जादू जगाकर भरी बज्म्ा़ में सब से नज़रें बचा कर
निगाहों की राहों से दिल में समा कर किसी ने तुम्हें भी चुराया तो होगा

कभी आईने से ख़ुद तेरी अंगड़ाईयों ने तेरे हुस्न को गुद-गुदाया तो होगा

निगाहों में शम्म-ए-तमन्ना जला कर तकी होंगी तुमने भी राहें किसी की
किसी ने तो वादा किया होगा तुमसे किसी ने तुम्हें भी स्र्लाया तो होगा

-अख्तर आजाद

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