मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते कहां हैं लोग
रोज़ मैं चांद बन के आता हूं
दिन में सूरज सा जगमगाता हूं
खन-खनाता हूं मां के गहनों में
हंसता रहता हूं छुप के बाहों में
मैं ही मज़दूर के पसीने में
मैं ही बरसात के महीने में
मेरी तस्वीर आंख का आंसू
मेरी तहरीर जिस्म का जादू
मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में
मुझको पहचानते नहीं जब लोग
मैं ज़मीनों को बे-ज़िया करके
आसमानों को लौट जाता हूं
मैं ख़ुदा बन के क़हर ढाता हूं
-निदा फाजली साहब








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